Tuesday, June 16, 2009

भगवान का दस्तूर भी अजीब है, कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता.....

मेरी साँसे चले, मेरे पल दिन कटे,
बीते मेरे दिना, तेरे बिना......

तुने दिया दर्दे जिगर, दिल पे हुआ ऐसा असर,
आँखें बंद जब करू, तेरा ही एक चेहरा,
लम्हा लम्हा यारा, आये नज़र,
तेरी कशिश तडपाती है, पागल मुझे कर जाती है,
दूरी तेरी अनजाने में, मेरे करीब तुझे लाती है,
दिल की लगी, दिल में आशिकी, सहना यहाँ, मुश्किल है बड़ा....
तेरे बिना ...तेरे बिना......

जानू ये मैं, जाने खुदा, तुझपे सदा हक़ है मेरा,
दावा है ये मेरा, आशिकी ये मेरी, धडकनों में तेरी रह जायेगी,
कहती मेरी दीवानगी, रूह में, तू ही तू बसी,
वीरानियों का है समा, तेरे सिवा ये ज़िन्दगी,
क्या ये ज़मीन, क्या आसमा,
सूने मेरे, है दोनों जहाँ,
तेरे बिना .....तेरे बिना....

7 comments:

हिमांशु । Himanshu said...

बेहतरीन रचना । धन्यवाद ।
ब्लॉग पर पहली बार आया । अच्छा लगा ।

अजय सकलानी said...

वाह बहुत अच्छा, मज़ा आ गया, जान दाल दी है आपने शब्दों में|

रूह को मेरी अब सकूं कहाँ,
भटकती फिरती है कहीं तन्हा,
इंतज़ार कब तक करे,
कैसे संभाले अब तेरे बिना,
तेरे बिना तेरे बिना....

श्यामल सुमन said...

प्रेम विरह का अद्भुत संगम कविता करे बयान।
सब को सब कुछ मिले नहीं क्यों ऐसा भगवान?

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!!

M Verma said...

सूने मेरे, है दोनों जहाँ,
तेरे बिना .....तेरे बिना....
समर्पित भावो को खूबसूरती से सजाया है बहुत अच्छा

परमजीत बाली said...

अपनी भावनाओं को सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

~♥~Dєєηค~♥~ said...

Aap Sabhi Ka Bahut Shukriya!!